अद्यैव न चिरादेवं भवेमस्त्रिदशेश्वराः । कुशलं च समादाय वर्तेरंस्तदवाप्तये ॥
वे सोचते हैं—हम भी शीघ्र ही देवताओं के समान बनें—और इस उद्देश्य से पुण्य कर्म करने लगते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।