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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 4 • श्लोक 1
विनेयधातौ विनयाभ्युपाये विनेयधातोर्विनयक्रियायाम् । तद्देशकाले गमने च नित्यं विभोरनाभोगत एव वृत्तिः ॥
योग्य प्राणियों के स्वभाव के अनुसार उन्हें शिक्षित करने के उपाय, शिक्षा देने की क्रिया तथा उसके लिए उचित देश और समय में—सर्वज्ञ भगवान का आचरण सदा बिना प्रयास के ही होता है।
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