मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 9
ज्ञेये वस्तुनि सर्वथात्मपरयोर्ज्ञानात् स्वयंज्ञापनाद् । ध्येये वस्तुनि हानिकारणकृतेः सेव्ये विधौ सेवनात् । प्राप्तव्ये च निरुत्तरेऽतिविमले प्राप्तेः परप्रापणाद् । आर्याणां स्वपरार्थसत्यकथनादस्तम्भितत्वं क्वचित् ॥
जो जानने योग्य है उसका पूर्ण ज्ञान स्वयं प्राप्त करके दूसरों को बताना; जो त्याज्य है उसके हानिकारक कारणों को समझाकर उसे छोड़ने की शिक्षा देना; जो आचरण करने योग्य मार्ग है उसका अभ्यास कराना; और जो परम, निर्मल तथा अनुत्तर अवस्था है उसे प्राप्त करके दूसरों को भी उस तक पहुँचाना—इन सबके कारण आर्यजन सत्य को निर्भय होकर कहते हैं और किसी प्रकार का संकोच नहीं करते।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें