जो जानने योग्य है उसका पूर्ण ज्ञान स्वयं प्राप्त करके दूसरों को बताना; जो त्याज्य है उसके हानिकारक कारणों को समझाकर उसे छोड़ने की शिक्षा देना; जो आचरण करने योग्य मार्ग है उसका अभ्यास कराना; और जो परम, निर्मल तथा अनुत्तर अवस्था है उसे प्राप्त करके दूसरों को भी उस तक पहुँचाना—इन सबके कारण आर्यजन सत्य को निर्भय होकर कहते हैं और किसी प्रकार का संकोच नहीं करते।
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