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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 8
सर्ववर्माभिसंबोधे विबन्धप्रतिषेधने । मार्गाख्याने निरोषाप्तौ वैशारद्यं चतुर्विधम् ॥
सर्वज्ञता की प्राप्ति में, बन्धनों के निरोध में, मार्ग के उपदेश में, और क्लेशों से पूर्ण मुक्ति में—इन चार विषयों में बुद्ध का चार प्रकार का वैशारद्य (निर्भीकता) होता है।
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