मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 7
स्थानास्थानविपाकधातुषु जगन्नानाधिमुक्तौ नये संक्लेशव्यवदान इन्द्रियगणे पूर्वे निवासस्मृतौ । दिव्ये चक्षुषि चास्रवक्षयविधावज्ञानवर्मा चलप्राकारद्रुमभेदनप्रभाकिरणच्छेदाद्बलं वज्रवत् ॥
स्थान-अस्थान, कर्मों के परिणाम, प्राणियों की विभिन्न प्रवृत्तियाँ, क्लेश और उनकी शुद्धि, इन्द्रियों की प्रकृति, पूर्वजन्मों की स्मृति, दिव्य चक्षु और आस्रवों के नाश का ज्ञान—इन सबके द्वारा बुद्ध का बल अज्ञान के कवच, किले और वृक्षों को काटने वाले वज्र के समान अजेय होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रत्नगोत्रविभाग के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

रत्नगोत्रविभाग के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें