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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 5
स्थानास्थाने विपाके च कर्मणामिन्द्रियेषु च । धातुष्वप्यधिमुक्तौ च मार्गे सर्वत्रगामिनि ॥
किस स्थान पर क्या संभव या असंभव है, कर्मों के परिणाम क्या होते हैं, प्राणियों की इन्द्रियों की प्रकृति क्या है, उनके धातु (स्वभाव) क्या हैं, उनकी प्रवृत्तियाँ कैसी हैं, और मुक्ति का मार्ग कैसा है—इन सबका ज्ञान बुद्ध को होता है।
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