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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 4
बलत्वमज्ञानवृतेषु वज्रवद् विशारदत्वं परिषत्सु सिंहवत् । तथागतावेणिकतान्तरीक्षवन्मुनेर्द्विधादर्शनमम्बुचन्द्रवत् ॥
बुद्ध का बल अज्ञान के आवरणों को वज्र की तरह भेद देता है; उनकी निडर वाणी सभाओं में सिंह की गर्जना के समान होती है; तथागत के विशिष्ट गुण आकाश के समान व्यापक होते हैं; और मुनि का ज्ञान दो प्रकार के सत्य को जल में प्रतिबिंबित चन्द्रमा की भाँति स्पष्ट दिखाता है।
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