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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 32
निर्भयत्वान्निरास्थत्वात्स्थैर्याद्विक्रमसंपदः । पर्षद्गणेष्ववैशारद्यं मुनिसिंहस्य सिंहवत् ॥
निर्भयता, आसक्ति-रहितता, स्थिरता और पराक्रम की संपदा के कारण, सभा में मुनिसिंह (बुद्ध) का वैशारद्य सिंह के समान प्रकट होता है।
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