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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 29
बलादिषु बलैः षड्भिस्त्रिभिरेकेन च क्रमात् । सर्वज्ञेयसमापत्तिसवासनमलोद्धृतेः ॥
बल आदि गुणों को क्रमशः छह, तीन और एक प्रकार से समझाया गया है; और इनके द्वारा समस्त ज्ञेय वस्तुओं का ज्ञान तथा अविद्या के अवशेषों का नाश बताया गया है।
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