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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 22
प्रभूतजिह्वतानन्ताचिन्त्यरसरसाग्रता । कलविङ्करुतं ब्रह्मस्वरता च स्वयंभुवः ॥
उनकी जिह्वा विशाल होती है; उनका वचन अनन्त और अचिन्त्य मधुरता से युक्त होता है; उनकी वाणी कलविङ्क पक्षी के स्वर के समान मधुर तथा ब्रह्मस्वर के समान गंभीर होती है।
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