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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 16
या क्षित्यादिषु धर्मता न नभसः सा घर्मता विद्य ते ये चानावरणादिलक्षणगुणा व्योम्नो न ते रूपिषु । क्षित्यम्बुज्वलनानिलाम्बरसमा लोकेषु साधारणा बुद्धावेणिकता न चाश्वपि पुनर्लोकेषु साधारणा ॥
जैसे पृथ्वी आदि तत्वों की जो धर्मता है वह आकाश की धर्मता नहीं होती, और आकाश के जो गुण हैं वे रूपधारी वस्तुओं में नहीं होते—उसी प्रकार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के गुण संसार में सामान्य हैं; परन्तु बुद्ध के अवेणिक गुण संसार में सामान्य नहीं होते।
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