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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 15
सर्वज्ञानपु रोजवानुपरिवर्त्यर्थेषु कर्मत्रयं त्रिष्वध्वस्वपराहता' सुविपुलज्ञानप्रवृत्तिध्रुवम् । इत्येषा जिनता महाकरुणया युक्तावबुद्धा जिनै-र्यद्वोषाज्जगति प्रवृत्तमभयदं सद्धर्मचक्रं महत् ॥
बुद्ध के तीनों प्रकार के कर्म (काय, वाणी, चित्त) सर्वज्ञान से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। तीनों कालों में उनका विशाल ज्ञान सतत प्रवाहित रहता है। इसी जिनत्व (बुद्धत्व) से, महान करुणा से युक्त होकर, बुद्धों ने संसार में भय को दूर करने वाला महान सद्धर्मचक्र प्रवर्तित किया।
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