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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 12
नोपेक्षाप्रतिसंख्याय हानिर्न च्छन्दवीर्यतः । स्मृतिप्रज्ञाविमुक्तिभ्यो विमुक्तिज्ञानदर्शनात् ॥
उपेक्षा या विचार से उनमें कोई हानि नहीं होती; न ही इच्छा और वीर्य (उत्साह) में कमी आती है; स्मृति, प्रज्ञा और विमुक्ति तथा विमुक्ति के ज्ञान-दर्शन में भी कोई कमी नहीं होती।
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