शास्ता (बुद्ध) के वचन कभी विचलित या असंगत नहीं होते; उनकी स्मृति कभी नष्ट नहीं होती; उनका चित्त कभी असमाहित नहीं होता और उनमें भेदभाव की संज्ञा भी नहीं होती।
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