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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 10
मुनीन्द्रसिंहोऽपि तथा गणेषु स्वस्थो निरास्थः स्थिरविक्रमस्थः ॥
मुनियों के इन्द्र (बुद्ध) भी सभा में सिंह के समान रहते हैं—वे पूर्णतः स्थिर, निर्भय, आसक्ति से रहित और अडिग पराक्रम वाले होते हैं।
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