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रत्नगोत्रविभाग • अध्याय 3 • श्लोक 1
स्वार्थः परार्थः परमार्थकायस्तदाश्रिता संवृतिकायता च । फलं विसंयोगविपाकभावादेतच्चतुःषष्टिगुणप्रभेदम् ॥
स्वार्थ (स्वयं की सिद्धि), परार्थ (अन्य प्राणियों का कल्याण), परम अर्थरूप धर्मकाय, तथा उस पर आधारित संवृतिकाय (रूपकाय) — इन सबका फल क्लेशों से पूर्ण वियोग और उनके परिपक्व परिणाम के रूप में प्रकट होता है। इस प्रकार यह कुल मिलाकर चौंसठ प्रकार के गुणों का विभाजन है।
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