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रघुवंशम् • अध्याय 9 • श्लोक 80
शापोऽप्यदृष्टतनयाननपद्मशोभे सानुग्रहो भगवता मयि पातितोऽयम् । कृष्यां दहन्नपि खलु क्षितिमिन्धनेद्धो बीजप्ररोहजननीं ज्वलनः करोति ॥
यह शाप भी मेरे लिए अनुग्रह ही है, क्योंकि अभी तक मैंने पुत्र का मुख नहीं देखा; जैसे अग्नि भूमि को जलाकर भी बीजों के अंकुरण का कारण बनती है।
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