न कृपणा प्रभवत्यपि वासवे न वितथा परिहासकथास्वपि । न च सपत्नजनेष्वपि तेन वागपरुषा परुषाक्षरमीरिता ॥
वह न तो इन्द्र के समान ऐश्वर्य में कृपण था, न ही उसकी बातें असत्य थीं, और शत्रुओं के प्रति भी उसने कभी कठोर वचन नहीं कहा।
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