स ललितकुसुमप्रवालशय्यां ज्वलितमहौषधिदीपिकासनाथाम् । नरपतिरतिवाहयांबभूव क्वचिदसमेतपरिच्छदस्त्रियामाम् ॥
कभी-कभी वह राजा सुगंधित पुष्पों और कोमल पत्तों की शय्या पर, औषधियों के प्रकाश से युक्त स्थानों में, अपनी रानियों के बिना ही रात्रि बिताने लगा।
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