उत्तस्थुषः सपदि पल्वलपङ्कमध्यान्मुस्ताप्ररोहकवलावयवानुकीर्णम् । जग्राह स द्रुतवराहकुलस्य मार्गं सुव्यक्तमार्द्रपदपङ्क्तिभिरायताभिः ॥
तालाब की कीचड़ से निकले और घास से ढके हुए तेज़ वराहों के झुंड के स्पष्ट गीले पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए उसने उनका मार्ग पकड़ लिया।
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