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रघुवंशम् • अध्याय 9 • श्लोक 58
तस्यापरेष्वपि मृगेषु शरान्मुमुक्षोः कर्णान्तमेत्य बिभिदे निबिडोऽपि मुष्टिः । त्रासातिमात्रचटुलैः स्मरतः सुनेत्रैः प्रौढप्रियानयनविभ्रमचेष्टितानि ॥
अन्य मृगों पर बाण चलाने के लिए हाथ उठाते समय भी, भय से चंचल उनकी आँखों को देखकर उसका दृढ़ संकल्प भी ढीला पड़ गया, जैसे प्रिय की आँखों की चंचलता स्मरण हो आए।
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