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रघुवंशम् • अध्याय 9 • श्लोक 44
उपचितावयवा शुचिभिः कणैरलिकदम्बकयोगमुपेयुषी । सदृशकान्तिरक्ष्यत मञ्जरी तिलकजालकजालकमौक्तिकैः ॥
स्वच्छ कणों और भौंरों के समूह से युक्त पुष्पमंजरी, मोतियों की माला जैसी शोभा धारण कर अपनी सुंदरता बनाए हुए थी।
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