अलिभिरञ्जनबिन्दुमनोहरैः कुसुमपङ्क्तिनिपातिभिरङ्कितः । न खलु शोभयति स्म वनस्थलीं न तिलकस्तिलकः प्रमदामिव ॥
भौंरों के अंजन बिन्दुओं जैसे चिन्हों और गिरे हुए फूलों की पंक्तियों से युक्त तिलक वृक्ष वनभूमि को वैसे नहीं शोभित कर रहा था जैसे स्त्री के मस्तक का तिलक उसे सुशोभित करता है।
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