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रघुवंशम् • अध्याय 9 • श्लोक 31
उपहितं शिशिरापगमश्रिया मुकुलजालमशोभत किंशुके । प्रणयिनीव नखक्षतमण्डनं प्रमदया मदयापितलज्जया ॥
शीत ऋतु के समाप्त होने पर किंशुक वृक्ष पर कलीयों का समूह ऐसा शोभित हो रहा था, मानो प्रेमिका के नख-चिह्नों से सजा शरीर, जो प्रेम में लज्जा त्याग चुकी हो।
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