शीत ऋतु के समाप्त होने पर किंशुक वृक्ष पर कलीयों का समूह ऐसा शोभित हो रहा था, मानो प्रेमिका के नख-चिह्नों से सजा शरीर, जो प्रेम में लज्जा त्याग चुकी हो।
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