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रघुवंशम् • अध्याय 8 • श्लोक 93
तस्य प्रसह्य हृदयं किल शोकशङ्कुः प्लक्षप्ररोह इव सौधतलं बिभेद । प्राणान्तहेतुमपि तं भिषजामसाध्यं लाभं प्रियानुगमने त्वरया स मेने ॥
उसके हृदय में शोक का शूल ऐसा धँस गया जैसे वृक्ष की जड़ भवन को चीर दे; वैद्य जिसे असाध्य मानते थे, उसी मृत्यु को उसने प्रिय के पास पहुँचने का साधन समझ लिया।
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