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रघुवंशम् • अध्याय 8 • श्लोक 91
स तथेति विनेतुरुदारमतेः प्रतिगॄह्य वचो विससर्ज मुनिम् । तदलब्धपदं हृदि शोकघने प्रतियातमिवान्तिकमस्य गुरोः ॥
उस उदार बुद्धि वाले गुरु के वचन को स्वीकार कर उसने मुनि को विदा किया, परन्तु शोक से भरे उसके हृदय में वे वचन ऐसे लौट आए मानो गुरु फिर से निकट आ गए हों।
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