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रघुवंशम् • अध्याय 8 • श्लोक 88
अवगच्छति मूढचेतनः प्रियनाशं हृदि शल्यमर्पितम् । स्थिरधीस्तु तदेव मन्यते कुशलद्वारतया समुद्धृतम् ॥
मूर्ख व्यक्ति प्रिय के वियोग को हृदय में शूल के समान अनुभव करता है, परन्तु धैर्यवान उसे मुक्ति का मार्ग मानकर स्वीकार करता है।
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