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रघुवंशम् • अध्याय 8 • श्लोक 87
मरणं प्रकृतिः शरीरिणां विकृतिर्जीवितमुच्यते बुधैः । क्षणमप्यवतिष्ठते श्वसन्यदि जन्तुर्ननु लाभवानसौ ॥
विद्वान कहते हैं कि मृत्यु शरीरधारियों की स्वाभाविक अवस्था है और जीवन अपवाद; यदि प्राणी एक क्षण भी जीवित रहता है तो वह लाभ में है।
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