गृहिणी सचिवः सखी मिथः प्रियशिष्या ललिते कलाविधौ । करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वां वद किं न मे हृतम् ॥
तुम मेरी पत्नी, मंत्री, सखी और कला में प्रिय शिष्या थीं; तुम्हें छीनकर इस निर्दयी मृत्यु ने मुझसे क्या नहीं छीन लिया?
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