धृतिरस्तमिता रतिश्च्युता विरतं गेयमृतुर्निरुत्सवः । गतमाभरणप्रयोजनं परिशून्यं शयनीयमद्य मे ॥
अब मेरा धैर्य समाप्त हो गया है, प्रेम नष्ट हो गया है, गीत बंद हो गए हैं, ऋतु उत्सवहीन हो गई है, आभूषणों का कोई उपयोग नहीं रहा और मेरा शयन भी शून्य हो गया है।
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