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रघुवंशम् • अध्याय 8 • श्लोक 59
कलमन्यभृतासु भासितं कलहंसीषु मदालसं गतम् । पृषतीषु विलोलमीक्षितं पवनाधूतलतासु विभ्रमाः ॥
तुम्हारी मधुर वाणी अब अन्य पक्षियों में सुनाई देती है, तुम्हारी चंचल दृष्टि हरिणियों में और तुम्हारी चेष्टाएँ वायु से हिलती लताओं में दिखाई देती हैं।
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