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रघुवंशम् • अध्याय 8 • श्लोक 58
इयमप्रतिबोधशायिनीं रशना त्वां प्रथमा रहःसखी । गतिविभ्रमसादनीरवा न शुचा नानु मृतेव लक्ष्यते ॥
यह तुम्हारी करधनी, जो तुम्हारी गुप्त सखी थी, अब तुम्हारे साथ निश्चेष्ट पड़ी है और उसकी ध्वनि भी नहीं रही, मानो वह भी तुम्हारे साथ मर गई हो।
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