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रघुवंशम् • अध्याय 8 • श्लोक 57
नवपल्लवसंस्तरेऽपि ते मृदु दूयेत यदङ्गमर्पितम् । तदिदं विषहिष्यते कथं वद वामोरु चिताधिरोहणम् ॥
हे सुन्दर जंघाओं वाली! तुम्हारा कोमल शरीर तो नए पत्तों के बिछौने पर भी दुखता था, अब वह चिता पर कैसे सहन करेगा?
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