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रघुवंशम् • अध्याय 8 • श्लोक 54
तदपोहितुमर्हसि प्रिये प्रतिबोधेन विषादमाशु मे । ज्वलितेन गुहागतं तमस्तुहिनाद्रेरिव नक्तमोषधिः ॥
हे प्रिय! इस भ्रम को दूर कर मेरे शोक को शीघ्र समाप्त करो, जैसे जली हुई औषधि हिमालय की गुफाओं के अंधकार को नष्ट कर देती है।
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