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रघुवंशम् • अध्याय 8 • श्लोक 52
मनसापि न विप्रियं मया कृतपूर्वं तव किं जहासि माम् । ननु शब्दपतिः क्षितेरहं त्वयि मे भावनिबन्धना रतिः ॥
मैंने मन से भी कभी तुम्हारा अहित नहीं किया, फिर तुम मुझे क्यों छोड़ गई? मैं पृथ्वी का स्वामी हूँ, परन्तु मेरा प्रेम तो तुम पर ही आधारित है।
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