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रघुवंशम् • अध्याय 8 • श्लोक 49
ध्रुवमस्मि शठः शुचिस्मिते विदितः कैतववत्सलस्तव । परलोकमसंनिवृत्तये यदनापृच्छ्य गतासि मामितः ॥
हे पवित्र मुस्कान वाली! निश्चय ही मैं तुम्हें छल से प्रेम करने वाला ज्ञात हुआ हूँ, तभी तुम बिना पूछे ही इस लोक से चली गई हो।
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