स्रगियं यदि जीवितापहा हृदये किं निहिता न हन्ति माम् । विषमप्यमृतं क्वचिद्भवेदमृतं वा विषमीश्वरेच्छया ॥
यदि यह माला प्राण लेने वाली है, तो हृदय में रखी होने पर मुझे क्यों नहीं मारती? क्योंकि ईश्वर की इच्छा से विष भी अमृत बन सकता है और अमृत भी विष।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
रघुवंशम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
रघुवंशम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।