विललाप स बाष्पगद्गदं सहजामप्यपहाय धीरताम् । अभितप्तमयोऽपि मार्दवं भजते कैव कथा शरीरिषु ॥
वह रोते हुए गद्गद वाणी में विलाप करने लगा, अपनी स्वाभाविक धीरता को छोड़कर; जब तप्त धातु भी कोमल हो जाती है, तो मनुष्यों की क्या बात।
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