पतिरङ्कनिषण्णया तया करणापायविभिन्नवर्णया । समलक्ष्यत बिभ्रदाविलां मृगलेखामुषसीव चन्द्रमाः ॥
गोद में बैठी हुई, इन्द्रियों से रहित होकर रंगहीन हुई उस स्त्री के साथ उसका पति ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे प्रातःकाल का चन्द्रमा धुंधली चाँदनी लिए हो।
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