रघुरश्रुमुखस्य तस्य तत्कृतवानीप्सितमात्मजप्रियः । न तु सर्प इव त्वचं पुनः प्रतिपेदे व्यपवर्जितां श्रियम् ॥
आँसू भरे मुख वाले अपने पुत्र की इच्छा को रघु ने पूरा किया, किन्तु सर्प की भाँति त्यागी हुई संपत्ति को फिर से ग्रहण नहीं किया।
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