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रघुवंशम् • अध्याय 7 • श्लोक 57
स दक्षिणं तूणमुखेन वामं व्यापारयन्हस्तमलक्ष्यताजौ । आकर्णकृष्टा सकृदस्य योद्धुर्मौर्वीव बाणान्सुषुवे रिपुघ्नान् ॥
वह युद्ध में दाहिने हाथ से तरकश से बाण निकालकर बाएँ हाथ से धनुष खींचते हुए, एक ही बार में अनेक शत्रुनाशक बाण छोड़ रहा था।
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