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रघुवंशम् • अध्याय 7 • श्लोक 41
रथो रथाङ्गध्वनिना विजज्ञे विलोलघण्टाक्वणितेन नागः । स्वभर्तुनामग्रहणाद्बभूव सान्द्रे रजस्यात्मपरावबोधः ॥
रथ के पहियों की ध्वनि से रथ पहचाने जाते थे और हाथियों की घंटियों की झंकार से वे; घनी धूल में अपने स्वामी का नाम लेकर ही अपने और पराए का भेद समझ में आता था।
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