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रघुवंशम् • अध्याय 7 • श्लोक 40
मत्स्यध्वजा वायुवशाद्विदीर्णैर्मुखैः प्रवृद्धध्वजिनीरजांसि । बभुः पिबन्तः परमार्थमत्स्याः पर्याविलानीव नवोदकानि ॥
वायु से फटे हुए ध्वजों के कारण उठी धूल को मानो मछलियाँ पी रही हों, जैसे गंदले जल को मछलियाँ पीती हैं।
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