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रघुवंशम् • अध्याय 7 • श्लोक 26
हविःशमीपल्लवलाजगन्धी पुण्यः कृशानोरुदियाय धूमः । कपोलसंसर्पिशिखः स तस्या मुहूर्तकर्णोत्पलतां प्रपेदे ॥
हवन और लाज की सुगंध से युक्त पवित्र धुआँ अग्नि से उठकर उसके गालों को स्पर्श करता हुआ क्षणभर के लिए उसके कानों के आभूषण जैसा प्रतीत हुआ।
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