प्रमुदितवरपक्षमेकतस्तत्क्षितिपतिमण्डलमन्यतो वितानम् । उषसि सर इव प्रफुल्लपद्मं कुमुदवनप्रतिपन्ननिद्रमासीत् ॥
एक ओर वर का पक्ष अत्यन्त प्रसन्न था और दूसरी ओर अन्य राजाओं का समूह मुरझाया हुआ था, जैसे प्रातःकाल में कमल खिलते हैं और कुमुदिनी सो जाती है।
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