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रघुवंशम् • अध्याय 6 • श्लोक 84
तया स्रजा मङ्गलपुष्पमय्या विशालवक्षःस्थललम्बया सः । अमंस्त कण्ठार्पितबाहुपाशां विदर्भराजावरजां वरेण्यः ॥
उस शुभ पुष्पों की माला से, जो उसके विशाल वक्ष पर लटक रही थी, उसने ऐसा अनुभव किया मानो विदर्भराज की बहन ने अपने भुजाओं का आलिंगन उसके गले में डाल दिया हो।
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