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रघुवंशम् • अध्याय 6 • श्लोक 83
सा चूर्णगौरं रघुनन्दनस्य धात्रीकराभ्यां करभोपमोरूः । आसञ्जयामास यथाप्रदेशं कण्ठे गुणं मूर्तमिवानुरागम् ॥
तब उस सुन्दरी ने, जिसकी जंघाएँ हाथी के शावक के समान थीं, धाय के हाथों से रघुनन्दन के गले में उचित स्थान पर पुष्पमाला डाल दी, मानो मूर्त रूप में अपना प्रेम ही अर्पित कर दिया हो।
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