सा यूनि तस्मिन्नभिलाषबन्धं शशाक शालीनतया न वक्तुम् । रोमाञ्चलक्ष्येण स गात्रयष्टिं भित्त्वा निराक्रामदरालकेश्याः ॥
उस लज्जाशील युवती ने अपने मन के प्रेम को शब्दों में व्यक्त नहीं किया, पर उसके शरीर में उत्पन्न रोमांच ने मानो उसकी कोमल देह को भेदकर उसके भाव प्रकट कर दिए।
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