तं प्राप्य सर्वावयवानवद्यं व्यावर्ततान्योपगमात्कुमारी । न हि प्रफुल्लं सहकारमेत्य वृक्षान्तरं काङ्क्षति षट्पदाली ॥
किन्तु उस निर्दोष रूप वाले कुमार को प्राप्त करके वह कन्या अन्य किसी के पास नहीं गई, जैसे भँवरों का समूह खिले हुए आम के वृक्ष को पाकर अन्य वृक्षों की इच्छा नहीं करता।
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