संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा । नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥
वह पतिवरण करने वाली कन्या जिस-जिस राजा को पार करती गई, वह- वह राजा ऐसा फीका पड़ गया जैसे रात्रि में दीपशिखा आगे बढ़ने पर पीछे अंधकार छा जाता है।
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